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जिला क्राइम रिपोर्टर हरिओम गुप्ता 🌐🌐🎤
लखीमपुर खीरी में सिंगाही थाने की बेलगाम पुलिस की गुंडई।
अगर न्यायालय में मामला विचाराधीन है, तो फैसला अदालत करेगी या थाना?
एक महिला का आरोप है कि पैतृक मकान के विवाद में पुलिस ने कानून की चौखट नहीं, बल्कि मकान की चौखट पर ही अपना ताला जड़ दिया। नतीजा—महिला और उसकी बेटी खुले आसमान के नीचे रहने को मजबूर।
आरोप ये भी हैं कि बेटी के साथ मारपीट हुई, लेकिन FIR नहीं लिखी गई। उल्टा न्याय मांगने वालों को ही रात में थाने में बैठाया गया। जब महिला ने वीडियो बनाकर अपनी बात जिले की कप्तान तक पहुंचानी चाही, तो आरोप है कि मोबाइल छीन लिया गया और यह लिखवा लिया गया कि “मैं मकान में नहीं रहूंगी।”
अगर ये आरोप सही हैं, तो सवाल सिर्फ एक महिला का नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम का है।
“मित्र पुलिस” का मतलब क्या अब यह रह गया है कि पीड़ित सड़क पर रहे और ताला पुलिस के संरक्षण में लगे?
वर्दी की ताकत कानून लागू करने के लिए होती है, किसी पक्ष को कब्जा दिलाने के लिए नहीं। न्यायालय में विचाराधीन मामले में पुलिस की भूमिका निष्पक्ष होनी चाहिए, न कि विवाद का हिस्सा बनने की।
उम्मीद है वरिष्ठ अधिकारी इस पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जांच कराएंगे और यदि आरोप सही पाए जाते हैं तो दोषियों पर कार्रवाई होगी। क्योंकि कानून का सम्मान तभी बचेगा, जब कानून लागू करने वाले भी कानून के दायरे में रहेंगे।
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